बस्तर के माटी संस्करण: बीजापुर-जगदलपुर, विशेष संपादक की कलम से बस्तर की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल: बीजापुर अस्पताल बना ‘रेफर सेंटर’, डिमरापाल में मरीजों पर हो रहा ‘प्रयोग
February 19, 2026
जगदलपुर /बीजापुर “बस्तर के माटी” : बस्तर संभाग की स्वास्थ्य सेवाओं पर एक गंभीर सवाल खड़ा हुआ है। एक तरफ बीजापुर जिला अस्पताल सिर्फ कागजों पर सुविधाओं से लैस दिखता है, जबकि हकीकत में यह महज एक ‘रिफर सेंटर’ बनकर रह गया है । वहीं दूसरी ओर, संभाग का सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित जगदलपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल (डिमरापाल) में मरीजों के साथ उनकी जिंदगी से खिलवाड़ करते हुए उन्हें ‘प्रयोग का केंद्र’ बना दिया है।
बीजापुर जिला अस्पताल: सुविधाओं के नाम पर सिर्फ रेफर
बीजापुर जिला अस्पताल को 150 बिस्तरों वाली आधुनिक सुविधा के रूप में सरकारी वेबसाइट पर दिखाया गया है, जहां जटिल सर्जरी तक की बात कही जाती है और एक सर्जरी करके अखबारों मे जनसंपर्क विभाग के माध्यम से समाचार प्रकाशित करवा कर वाहवाही लूटने मे लगी है । हालांकि, हकीकत यह है कि यह अस्पताल महज एक रेफरल केंद्र बनकर रह गया है। स्थानीय निवासियों और राजनीतिक दलों ने कई बार यह आरोप लगाया है कि गंभीर मरीजों को प्राथमिक इलाज देने के बजाय सीधे जगदलपुर मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर कर दिया जाता है। सड़क दुर्घटना में घायल बुजुर्ग महिला का हालिया मामला हो या कोई अन्य गंभीर बीमारी, मरीजों को बेहतर इलाज के लिए 200 किलोमीटर का सफर तय करने को मजबूर होना पड़ता है । आधिकारिक दावों के विपरीत, जमीनी हकीकत यही है कि यहां बुनियादी सुविधाओं और विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के चलते मरीजों को जगदलपुर की राह देखनी पड़ती है।
डिमरापाल मेडिकल कॉलेज अस्पताल: इलाज का नाम, प्रयोगशाला का काम
7 जिलों के लिए रेफरल सेंटर होने का दावा करने वाला जगदलपुर का डिमरापाल मेडिकल कॉलेज अस्पताल अब विवादों के घेरे में है। अस्पताल प्रशासन पर मरीजों को बेहतर इलाज का झांसा देकर रायपुर या अन्य बड़े शहरों में रेफर न करने की सलाह न देकर मरीजों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं।
इस मामले को लेकर बस्तर के माटी के संपादक घनश्याम यादव ने भी अपनी आपबीती साझा की है। संपादक संघ छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार ने खुद के साथ हुई घटना का जिक्र करते हुए बताया कि जब उनकी 13 वर्षीय सुपुत्री खनक यादव की हालत गंभीर हो गई और दिमाग ने काम करना बंद कर दिया, तब भी अस्पताल अधीक्षक ने उन्हें रायपुर रेफर नही किया और वेंटीलेटर पर रखकर तरह तरह की प्रयोग करने लगे । उनका तर्क था कि यहां भी इलाज संभव है और उन्हें झूठी उम्मीद के सहारे यहीं रोके रखा गया। जबकि बुखार की हालत में 4 दिनो से बेहोशी थी और जगदलपुर मेडिकल कालेज मे न न्यूरोलाजिस्ट है न कोई हार्ट स्पेशलिस्ट।
पत्रकार का आरोप है कि “अस्पताल के डॉक्टर मरीजों की जान से खिलवाड़ करते हुए उन्हें सिर्फ इसलिए रायपुर नहीं भेज रहे, ताकि यहां के छात्र-छात्राओं को गंभीर मरीजों पर ‘प्रयोग’ करके सीखने का मौका मिलता रहे।” उन्होंने कहा कि “भारत वर्ष में एक समान उपचार” की बातें करके मरीजों और परिजनों को गुमराह किया गया, ताकि मरीज को बाहर ले जाने से रोका जा सके। उनका कहना था कि अगर मरीज रायपुर चला जाता है तो डिमरापाल के छात्रों को ऐसा केस कहां मिलेगा, जिस पर वे प्रैक्टिस कर सकें?
अधीक्षक पर गंभीर आरोप: निजी क्लीनिक और मरीजों से खिलवाड़
समाचार पत्र ‘बस्तर के माटी’ के पास ऐसी कई खबरें हैं, जिनमें दिखता है कि कैसे बड़े अस्पतालों के अधीक्षक स्वयं निजी क्लीनिक चलाकर अस्पताल के मरीजों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं। आरोप है कि मरीजों को सरकारी अस्पताल में भर्ती करने के बजाय उन्हें अपने निजी क्लीनिकों में इलाज कराने की सलाह दी जाती है, जहां भारी फीस वसूली जाती है। यह भी बताया जा रहा है कि आपात स्थिति में सेंट्रल ब्लड बैंक के नाम पर होने के बावजूद मरीजों को खून तक उपलब्ध नहीं कराया जा रहा, जिससे मरीजों की जान पर बन आती है।
प्रशासन की मुहर, मगर सुधार कहां?
हाल ही में डिमरापाल स्थित सुपर स्पेशलिस्ट हॉस्पिटल (जिसे कॉन्टिनेंटल हॉस्पिटल द्वारा संचालित किया जा रहा है) में मनमाने शुल्क और सुविधाओं को लेकर शिकायतें मिलने के बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग के सीएमई रितेश अग्रवाल को निरीक्षण के लिए भेजा गया था। उन्होंने ओपीडी टिकट 10 रुपये करने और आयुष्मान कार्डधारियों के मुफ्त इलाज के निर्देश दिए थे । लेकिन सवाल यह है कि मेडिकल कॉलेज अस्पताल की मूलभूत व्यवस्थाओं पर कब नकेल कसी जाएगी? जब तक बड़े अस्पतालों में यह स्थिति है और जिला अस्पताल सिर्फ रेफर सेंटर बने हैं, तब तक बस्तर की जनता की स्वास्थ्य सुरक्षा पर गंभीर सवाल खडे होते रहेंगे ।
बीजापुर का जिला अस्पताल ‘रेफर सेंटर’ बनकर मरीजों को जगदलपुर धकेल रहा है, और जगदलपुर का मेडिकल कॉलेज अस्पताल उन्हें रोककर ‘प्रयोग’ का विषय बना रहा है। यह दोहरी मार बस्तर के आम आदमी की स्वास्थ्य के मौलिक अधिकार पर सीधा प्रहार है। प्रशासन को अब सिर्फ निरीक्षण और निर्देश तक सीमित न रहकर ठोस कार्रवाई करनी होगी, ताकि अस्पतालों का नाम ‘प्रयोगशाला’ न रहकर ‘इलाज की जगह’ बना रहे।
बीजापुर जिला अस्पताल: सुविधाओं के नाम पर सिर्फ रेफर
बीजापुर जिला अस्पताल को 150 बिस्तरों वाली आधुनिक सुविधा के रूप में सरकारी वेबसाइट पर दिखाया गया है, जहां जटिल सर्जरी तक की बात कही जाती है और एक सर्जरी करके अखबारों मे जनसंपर्क विभाग के माध्यम से समाचार प्रकाशित करवा कर वाहवाही लूटने मे लगी है । हालांकि, हकीकत यह है कि यह अस्पताल महज एक रेफरल केंद्र बनकर रह गया है। स्थानीय निवासियों और राजनीतिक दलों ने कई बार यह आरोप लगाया है कि गंभीर मरीजों को प्राथमिक इलाज देने के बजाय सीधे जगदलपुर मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर कर दिया जाता है। सड़क दुर्घटना में घायल बुजुर्ग महिला का हालिया मामला हो या कोई अन्य गंभीर बीमारी, मरीजों को बेहतर इलाज के लिए 200 किलोमीटर का सफर तय करने को मजबूर होना पड़ता है । आधिकारिक दावों के विपरीत, जमीनी हकीकत यही है कि यहां बुनियादी सुविधाओं और विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के चलते मरीजों को जगदलपुर की राह देखनी पड़ती है।
डिमरापाल मेडिकल कॉलेज अस्पताल: इलाज का नाम, प्रयोगशाला का काम
7 जिलों के लिए रेफरल सेंटर होने का दावा करने वाला जगदलपुर का डिमरापाल मेडिकल कॉलेज अस्पताल अब विवादों के घेरे में है। अस्पताल प्रशासन पर मरीजों को बेहतर इलाज का झांसा देकर रायपुर या अन्य बड़े शहरों में रेफर न करने की सलाह न देकर मरीजों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं।
इस मामले को लेकर बस्तर के माटी के संपादक घनश्याम यादव ने भी अपनी आपबीती साझा की है। संपादक संघ छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार ने खुद के साथ हुई घटना का जिक्र करते हुए बताया कि जब उनकी 13 वर्षीय सुपुत्री खनक यादव की हालत गंभीर हो गई और दिमाग ने काम करना बंद कर दिया, तब भी अस्पताल अधीक्षक ने उन्हें रायपुर रेफर नही किया और वेंटीलेटर पर रखकर तरह तरह की प्रयोग करने लगे । उनका तर्क था कि यहां भी इलाज संभव है और उन्हें झूठी उम्मीद के सहारे यहीं रोके रखा गया। जबकि बुखार की हालत में 4 दिनो से बेहोशी थी और जगदलपुर मेडिकल कालेज मे न न्यूरोलाजिस्ट है न कोई हार्ट स्पेशलिस्ट।
पत्रकार का आरोप है कि “अस्पताल के डॉक्टर मरीजों की जान से खिलवाड़ करते हुए उन्हें सिर्फ इसलिए रायपुर नहीं भेज रहे, ताकि यहां के छात्र-छात्राओं को गंभीर मरीजों पर ‘प्रयोग’ करके सीखने का मौका मिलता रहे।” उन्होंने कहा कि “भारत वर्ष में एक समान उपचार” की बातें करके मरीजों और परिजनों को गुमराह किया गया, ताकि मरीज को बाहर ले जाने से रोका जा सके। उनका कहना था कि अगर मरीज रायपुर चला जाता है तो डिमरापाल के छात्रों को ऐसा केस कहां मिलेगा, जिस पर वे प्रैक्टिस कर सकें?
अधीक्षक पर गंभीर आरोप: निजी क्लीनिक और मरीजों से खिलवाड़
समाचार पत्र ‘बस्तर के माटी’ के पास ऐसी कई खबरें हैं, जिनमें दिखता है कि कैसे बड़े अस्पतालों के अधीक्षक स्वयं निजी क्लीनिक चलाकर अस्पताल के मरीजों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं। आरोप है कि मरीजों को सरकारी अस्पताल में भर्ती करने के बजाय उन्हें अपने निजी क्लीनिकों में इलाज कराने की सलाह दी जाती है, जहां भारी फीस वसूली जाती है। यह भी बताया जा रहा है कि आपात स्थिति में सेंट्रल ब्लड बैंक के नाम पर होने के बावजूद मरीजों को खून तक उपलब्ध नहीं कराया जा रहा, जिससे मरीजों की जान पर बन आती है।
प्रशासन की मुहर, मगर सुधार कहां?
हाल ही में डिमरापाल स्थित सुपर स्पेशलिस्ट हॉस्पिटल (जिसे कॉन्टिनेंटल हॉस्पिटल द्वारा संचालित किया जा रहा है) में मनमाने शुल्क और सुविधाओं को लेकर शिकायतें मिलने के बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग के सीएमई रितेश अग्रवाल को निरीक्षण के लिए भेजा गया था। उन्होंने ओपीडी टिकट 10 रुपये करने और आयुष्मान कार्डधारियों के मुफ्त इलाज के निर्देश दिए थे । लेकिन सवाल यह है कि मेडिकल कॉलेज अस्पताल की मूलभूत व्यवस्थाओं पर कब नकेल कसी जाएगी? जब तक बड़े अस्पतालों में यह स्थिति है और जिला अस्पताल सिर्फ रेफर सेंटर बने हैं, तब तक बस्तर की जनता की स्वास्थ्य सुरक्षा पर गंभीर सवाल खडे होते रहेंगे ।
बीजापुर का जिला अस्पताल ‘रेफर सेंटर’ बनकर मरीजों को जगदलपुर धकेल रहा है, और जगदलपुर का मेडिकल कॉलेज अस्पताल उन्हें रोककर ‘प्रयोग’ का विषय बना रहा है। यह दोहरी मार बस्तर के आम आदमी की स्वास्थ्य के मौलिक अधिकार पर सीधा प्रहार है। प्रशासन को अब सिर्फ निरीक्षण और निर्देश तक सीमित न रहकर ठोस कार्रवाई करनी होगी, ताकि अस्पतालों का नाम ‘प्रयोगशाला’ न रहकर ‘इलाज की जगह’ बना रहे।



