मृत्यु को भी मंगलमय बनाती है श्रीमद् भागवत कथा-आचार्य श्री राजेन्द्र महराज
November 12, 2025(बिर्रा में कर्ष परिवार द्वारा आयोजित संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा द्वितीय दिवस)
जितेन्द्र तिवारी जांजगीर चांपा
बिर्रा l भागवत की नियति ब्रह्म मय होना है , भगवत परायण बनाना है।भागवत की कथा से हृदय में भक्ति का उदय होता है और जीवन की व्यथा दूर होती है।निराकार ब्रह्म को कथा के माध्यम से हम साकार रूप में समझ पाते हैं । सनातन में वैदिक और पौराणिक काल से कथा की प्राचीन परंपरा है ,। यह उद्गार बिर्रा में कर्ष । परिवार द्वारा आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे दिन व्यासपीठ से प्रसिद्ध कथा वाचक आचार्य श्री राजेंद्र महाराज जी ने प्रकट किया ।आचार्य ने बताया की भागवत भगवान के अवतारों का इतिहास है । मनुष्य को अपने भावी। जन्म की तैयारी इसी जन्म में ही करना पड़ता है ,। राजा परीक्षित को श्रृंगी ऋषि ने श्राप दिया की 7 दिन में तक्षक नाग के डसने से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी । तब राजा परीक्षित के जीवन में सद्गुरु बनकर शुकदेव जी महाराज का आगमन हुआ और उन्होंने बताया कि दो घड़ी का सत्संग ही मनुष्य के सद्गति का कारण बनता है । अभी तो तुम्हारे जीवन में 7 दिन बाकी है इसलिए सत्संग करो क्योंकि सत्संग ही भगवत प्राप्ति की पहली सीढ़ी है ।इस संसार में पहली बार श्रीमद् भागवत की कथा शुकदेव जी महाराज के मुख से प्रवाहित हुई जिसे राजा परीक्षित ने श्रवण किया ।आचार्य श्री ने कहा कि श्रीमद् भागवत कथा मृत्यु को भी मंगलमय बनाती है। उनके द्वारा द्वारा सृष्टि वर्णन देवहूति संवाद प्रसंग एवं ध्रुव चरित्र की कथा का विस्तार से वर्णन किया गया ।आचार्य श्री ने बताया कि माता सुनीति ने अपने 5 वर्ष के पुत्र को भगवान की तपस्या अर्थात उसके हृदय में अध्यात्म और भक्ति का रोपण किया दिव्य संस्कारों का आधान किया माता ही अपने संतान की प्रथम गुरु होती है । बेटे और बेटियां देने का काम तो भगवान करते हैं किंतु उन्हें योग्य और दक्षता प्रदान करना माता-पिता का ही कार्य है । माता सुनीति की प्रेरणा से ध्रुव जी ने भगवान को अपने भक्ति के बल पर सातवें आसमान से नीचे उतरा था । भगवान हमेशा अपने भक्त के वशीभूत हो जाते हैं भक्ति की डोर से ही भगवान को बांधा जा सकता है ध्रुव जी ने संकल्प किया था देहम वा पात वामी कार्यम वा साधयामी अर्थात् या तो अपने कार्य को सिद्ध करूंगा या फिर अपना देह ही त्याग दूंगा । दृढ़ संकल्प करने पर हमारा कठिन से कठिन कार्य भी सिद्ध हो जाता है भगवान की भक्ति के बल पर ध्रुव जी को ध्रुव लोक की प्राप्ति हुई जो आज भी ध्रुव तारा के नाम से विख्यात है।इस प्रसंग में यदि उसे दिन माता सुनीति छोटी महारानी सुरुचि से यह कह दी होती कि मेरे लाडले बेटे को तपस्या के लिए भेजने वाली तुम कौन होती हो बड़ी महारानी मैं हूं और मेरा बेटा ही इस राज्य का उत्तराधिकारी होगा। तो आज ध्रुव चरित्र की कथा श्रीमद् भागवत महापुराण में नहीं होती।श्रीमद् भागवत महापुराण में श्री कृष्ण चरित्र का विस्तार होने के बाद भी इसे अन्य पुराणों की तरह श्री कृष्ण पुराण नहीं कहा बल्कि इसे श्रीमद् भागवत महापुराण कहा वह इसलिए के इस महापुराण में केवल भगवान की ही नहीं बल्कि उनके प्रिय भक्तों की कथा का विस्तार किया गया है lकथा श्रवण करने हेतु श्रोताओं की भीड़ उमड़ रही है आयोजक कर्ष परिवार द्वारा कथा श्रवण का पुण्य लाभ प्राप्त करने अधिक से अधिक संख्या में आने की अपील की गई है lआज की कथा में मुख्य यजमान अनंदराम कर्ष,छतबाई कर्ष -अनंदराम कर्ष रजनी -राजकमल कर्ष मंजू सुरेश कुमार कर्ष ममता कर्ष डिम्पल कर्ष सुमीत कर्ष एवं कर्ष परिवार सहित बड़ी संख्या में महिला श्रद्धालु उपस्थित थे।कथा के अंत में भारत माता और राजगीत छत्तीसगढ़ महतारी की मंगलमय आरती की गई।





